October 22, 2026

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एक बार फिर ईवीएम कांग्रेस के निशाने पर

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– राकेश अचल

भारत में विमर्श के लिए राजनीति के अलावा और कोई मुद्दा खड़ा ही नहीं हो पाता । भाजपा की तीन राज्यों में प्रचंड विजय के बाद अब चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन यानि ‘ ईवीएम ‘ एक बार फिर से कांग्रेस के निशाने पर है । आप यह भी कह सकते हैं कि ईवीएम विपक्ष के निशाने पर है। लेकिन सवाल ये है कि ईवीएम क्या सचमुच भारत की निर्वाचन प्रक्रिया को दूषित कर रही है या उसे यूं ही बदनाम किया जा रहा है ?
ईवीएम की कहानी बड़ी दिलचस्प है । ईवीएम का जन्म कांग्रेस के शासनकाल में हुआ और अब यही ईवीएम कांग्रेस के लिए भस्मासुर बन गयी है। भारत में इलेक्ट्रोनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (बैंगलोर) और भारत इलेक्ट्रानिक्स (हैदराबाद) द्वारा 1989 में ईवीएम को बनाने की शुरुआत हुई थी। तब इसे एक साहसिक कदम माना जा रहा था। प्रयोग के तौर पर इस ईवीएम का इस्तेमाल सबसे पहले केरल के उत्तर पारावुर विधानसभा के 50 मतदान केंद्रों में हुए उपचुनाव में किया गया। कांग्रेस सरकार ने ही साल 2004 से सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए इस मशीन का इस्तेमाल शुरू किया।
ईवीएम उस जमाने में आयी जब मतदान कागज की पर्चियों पर होता था। उस समय राजनीति में बूथ कैप्चरिंग सबसे बड़ी समस्या थी । ईवीएम का विकास शायद इसी बुराई को दूर करने के लिए किया गया था।ईवीएम की खास बात यह है कि इससे बूथ कैप्चरिंग काफी मुश्किल है ,क्योंकि एक ईवीएम एक मिनट में सिर्फ 5 वोट ही दर्ज कर सकती है । एक ईवीएम में अधिकतम 2000 वोटों को रिकार्ड किया जा सकता है,और एक ईवीएम में नोटा सहित अधिकतम 64 उम्मीदवारों के नाम अंकित किए जा सकते है। ख़ास बात ये है कि ईवीएम को चलाने के लिए बिजली की जरूरत नहीं होती है,यह बैटरी से चलती है। मजे की बात ये है कि ईवीएम लाने वाली कांग्रेस ने ही सबसे पहले इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाये लेकिन फिर भी ईवीएम को बदला किसी ने नही। ईवीएम पिछले 20 साल में अनेक चुनाव करा चुकी है । ईवीएम प्रायःसभी राजनैतिक दलों के निशाने पर रही है । ईवीएम पर सबसे बड़ा आरोप है कि उसे ‘ हैक ‘ किया जा सकता है।
जहाँ तक मुझे याद है कि 19 मई, 1982 को परवूर विधानसभा में ईवीएम से चुनाव कराये गए थे। मुकाबला सीपीआई के प्रत्‍याशी सिवन पिल्लई और कांग्रेस के पूर्व विधानसभा अध्‍यक्ष एसी जोज़ के बीच था। सीपीआई के सिवन पिल्‍लई ने कांग्रेस के एसी जोज़ को हरा दिया था। पिल्‍लई को 30,450 वोट मिले थे, जबकि जोज़ को 30,327। अंतर बहुत कम था। इसके बावजूद कांग्रेस ने ईवीएम पर सवाल उठाए। जोज़ ने हार नहीं मानीं। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। तब शिकायत ईवीएम हैक करने की नहीं थी तब जॉज की शिकायत थी कि बिना संसदीय अनुमति के चुनाव आयोग ने इलेक्‍शन में ईवीएम का इस्‍तेमाल किया। हालांकि कोर्ट ने जोज़ की याचिका को खारिज कर दिया, पर वो रुके नहीं। मामला सुप्रीम कोर्ट में लेकर गए। सुप्रीम कोर्ट ने परवूर विधानसभा के उन 50 बूथों पर बैलट पेपर के जरिए दोबारा मतदान कराने के आदेश दिए।इतना ही नहीं, दोबारा हुए चुनाव में जोज़ दो हजार मतों के अंतर से चुनाव भी जीत गए। यानि ईवीएम कोर्ट में हार गयी। सुप्रीम कोर्ट के 1984 में आए आदेश के बाद चुनाव आयोग ने ईवीएम के इस्‍तेमाल पर रोक लगा दी। हालांकि बाद में संसद ने ईवीएम को वैध बनाने के लिए अपने अध‍िनियम में संशोधन किया और 1998 से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में इसका इस्‍तेमाल किया जाने लगा।
पिछले दो दशकों में देश का ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जिसने ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े न किये हो । आज सत्तारूढ़ भाजपा हो या सत्ता से बाहर बसपा ,सपा ,जेडीयू हो या कांग्रेस सबको ईवीएम संदिग्ध लगती है।
अब स्थिति ये है कि ईवीएम की जन्मदात्री कांग्रेस को ही ईवीएम पर भरोसा नहीं है ।अब नए सिरे से ईवीएम पर रोक की मांग की जाने लगी है। तर्क दिए जाने लगे हैं कि ईवीएम न सिर्फ हैक हो रही है बल्कि इससे मतदान की गोपनीयता भी भंग हो रही है । मतदाता की जान को खतरा बढ़ रहा है ,क्योंकि अब प्रत्याशी को बूथ के हिसाब से मतों की गणना का आंकड़ा मिल रहा है। मतदाता की पहचान आसान हो गयी है। मतपत्रों से चुनाव के वक्त ऐसा सम्भव नहीं था क्योंकि सब मतपत्र गड्डमड्ड कर दिए जाते थे।
मुझे लगता है कि ईवीएम को लेकर देश में एक बार फिर से बवाल होगा । शायद मामला अदालत तक भी जायेगा। फिर इसे बंद कर पुरानी प्रक्रिया पर लौटने की बात की जाएगी ,सैकड़ों तर्क दिए जायेंगे,प्रमाण दिए जायेंगे ये बात सही है कि भारत जैसे विशाल देश में चुनाव प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्षता को बनाये रखने के लिए ईवीएम पर उठ रहे सवालों के उत्तर मिलने चाहिए,क्योंकि इससे लोकतंत्र की पवित्रता का मामला भी बाबस्ता है। बार-बार कहा जाता है कि दुनिया के तमाम बड़े लोकतांत्रिक देशों में मशीन का इस्तेमाल चुनाव में नहीं किया जाता तो भारत में इसकी क्या जरूरत है ?भारत में भी अमेरिका की तरह कागज के मतपत्रों से ही चुनाव होना चाहिए पर यह भी सभी को मानना पड़ेगा कि ईवीएम के उपयोग से बूथ कैप्चरिंग पर तो रोकथाम लगी है।
चुनाव प्रक्रिया से ईवीएम का विस्थापन आसान भी नहीं है क्योंकि इसके अनेक फायदे भी गिनाए जा सकते हैं।
यदि देश में एक राष्ट्र ,एक चुनाव हुए तो कहा जाता है कि देश के चुनाव आयोग को लगभग 30 लाख कंट्रोल यूनिट, लगभग 43 लाख बैलेट यूनिट और लगभग 32 लाख वीवीपीएट की आवश्यकता होगी।लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए लगभग 35 लाख वोटिंग यूनिट (कंट्रोल यूनिट, बैलेट यूनिट और वीवीपीएटी यूनिट) की कमी है।एक साथ चुनाव कराने पर विचार-विमर्श तेज होने के बीच निर्वाचन आयोग ने कुछ महीने पहले विधि आयोग को सूचित किया था कि उसे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को रखने के लिए पर्याप्त भंडारण सुविधाओं की भी आवश्यकता होगी।(विभूति फीचर्स)

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