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सच की रहा पर सबसे आगे

आया राम, गया राम का खेल पंजाब में जारी

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– सुभाष आन्नद

देश में ज्यों ज्यों लोकसभा चुनाव नजदीक आते हैं, कई छोटे बड़े नेताओं को पार्टी में घुटन महसूस होने लगती है,जिसके कारण वह एक पार्टी को छोड़ कर दूसरी पार्टी में कूदने को तैयार रहते हैं। पंजाब में भी यही हो रहा है। कांग्रेस पार्टी विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित हुई तो पार्टी के कई वरिष्ठ नेता पार्टी को अलविदा कहकर भारतीय जनता पार्टी की शरण में जा बैठे।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह पार्टी छोड़ गए और उनके बाद पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहे सुनील जाखड़ ने भी पार्टी से किनारा कर लिया, फिरोजपुर के बड़े कांग्रेसी नेता राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी ने भी पाला बदला परंतु पार्टी के अन्य नेता डाक्टर महेंद्र रिणवा,हंसराज जोशन, राजकुमार, वेरका ने अकाली दल और भाजपा का दाम छोड़ पुन: कांग्रेस का दामन थाम लिया है। कैप्टन अमरेंद्र सिंह व उनकी पत्नी परनीत कौर व पुत्री ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। सुनील जाखड़ जो इस समय पंजाब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन है उनके भांजे अबोहर से कांग्रेसी टिकट पर विधायक हैं, अगर उन्हें भा.ज.पा में जाना है तो उन्हें अबोहर से पुन: चुनाव लडऩा होगा। पंजाब में अफवाहें पूरी तरह गर्म हैं,कुछ लोग कह रहे हैं नवजोत सिद्धू भी भाजपा में जा रहे हैं। मनप्रीत बादल भा.ज.पा में घुटन महसूस कर रहे हैं जो आदर सम्मान उन्हें कांग्रेस पार्टी में मिला ,वह भाजपा में नहीं मिल रहा।

बलबीर सिंह सिद्धू की भी घर वापसी हो सकती है,क्योंकि वह समझते हैं कि भाजपा में शामिल होकर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है, राजनीतिक विश्लेषक जोगिंदर सिंह कुमार का कहना है कि नेता अपने उज्जवल भविष्य के लिए दल-बदल करते रहते हैं,लोकतंत्र के इस आधुनिक बाजार में यह मानना गलत है कि राजनीतिक दल विचारधारा द्वारा शासित होते हैं।

आया राम, गया राम की राजनीति में अकाली दल भी पीछे नहीं है, कई बड़े सिख नेता अकाली दल का दामन छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव की तारीख घोषित होने पर नेताओं के पैंतरे बदलते जा रहे हैं।

आजकल राजनीति का खेल खतरनाक पैमाने पर पहुंच चुका है, राजनीति की तुलना में गटर भी अधिक स्वच्छ दिखाई देता है, भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां पर सरकारें चुनावों के आधार पर चुनी जाती हैं, लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए नेता दल बदलने में देर नहीं लगाते, नेताओं का लक्ष्य केवल सत्ता प्राप्त करना होता है। दलबदल की प्रवृति राजनीतिक चकाचौंध के वर्तमान माहौल में बड़ी तेजी से बढ़ रही है। (विनायक फीचर्स)

आया राम, गया राम का खेल पंजाब में जारी

– सुभाष आनंद

देश में ज्यों ज्यों लोकसभा चुनाव नजदीक आते हैं, कई छोटे बड़े नेताओं को पार्टी में घुटन महसूस होने लगती है,जिसके कारण वह एक पार्टी को छोड़ कर दूसरी पार्टी में कूदने को तैयार रहते हैं। पंजाब में भी यही हो रहा है। कांग्रेस पार्टी विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित हुई तो पार्टी के कई वरिष्ठ नेता पार्टी को अलविदा कहकर भारतीय जनता पार्टी की शरण में जा बैठे।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह पार्टी छोड़ गए और उनके बाद पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहे सुनील जाखड़ ने भी पार्टी से किनारा कर लिया, फिरोजपुर के बड़े कांग्रेसी नेता राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी ने भी पाला बदला परंतु पार्टी के अन्य नेता डाक्टर महेंद्र रिणवा,हंसराज जोशन, राजकुमार, वेरका ने अकाली दल और भाजपा का दाम छोड़ पुन: कांग्रेस का दामन थाम लिया है। कैप्टन अमरेंद्र सिंह व उनकी पत्नी परनीत कौर व पुत्री ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। सुनील जाखड़ जो इस समय पंजाब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन है उनके भांजे अबोहर से कांग्रेसी टिकट पर विधायक हैं, अगर उन्हें भा.ज.पा में जाना है तो उन्हें अबोहर से पुन: चुनाव लडऩा होगा। पंजाब में अफवाहें पूरी तरह गर्म हैं,कुछ लोग कह रहे हैं नवजोत सिद्धू भी भाजपा में जा रहे हैं। मनप्रीत बादल भा.ज.पा में घुटन महसूस कर रहे हैं जो आदर सम्मान उन्हें कांग्रेस पार्टी में मिला ,वह भाजपा में नहीं मिल रहा।

बलबीर सिंह सिद्धू की भी घर वापसी हो सकती है,क्योंकि वह समझते हैं कि भाजपा में शामिल होकर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है, राजनीतिक विश्लेषक जोगिंदर सिंह कुमार का कहना है कि नेता अपने उज्जवल भविष्य के लिए दल-बदल करते रहते हैं,लोकतंत्र के इस आधुनिक बाजार में यह मानना गलत है कि राजनीतिक दल विचारधारा द्वारा शासित होते हैं।

आया राम, गया राम की राजनीति में अकाली दल भी पीछे नहीं है, कई बड़े सिख नेता अकाली दल का दामन छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव की तारीख घोषित होने पर नेताओं के पैंतरे बदलते जा रहे हैं।

आजकल राजनीति का खेल खतरनाक पैमाने पर पहुंच चुका है, राजनीति की तुलना में गटर भी अधिक स्वच्छ दिखाई देता है, भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां पर सरकारें चुनावों के आधार पर चुनी जाती हैं, लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए नेता दल बदलने में देर नहीं लगाते, नेताओं का लक्ष्य केवल सत्ता प्राप्त करना होता है। दलबदल की प्रवृति राजनीतिक चकाचौंध के वर्तमान माहौल में बड़ी तेजी से बढ़ रही है। (विफी)

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