अखाड़ा परिषद में ‘वर्चस्व’ की जंग: हरि गिरि महाराज का पलटवार, कहा— “जांच शुरू हुई तो पद याद आने लगा”
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उज्जैन। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद में अध्यक्ष पद को लेकर चल रही रार अब खुलकर सामने आ गई है। रविवार को महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रवींद्र पुरी महाराज द्वारा खुद को अध्यक्ष बताए जाने और 8 अखाड़ों के समर्थन का दावा करने के बाद, सोमवार को परिषद के महामंत्री हरि गिरि महाराज ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सपना देखना सबका हक है, लेकिन अध्यक्ष का चयन हवा में नहीं, बल्कि संविधान और एजेंडे के तहत होता है।
जमीन की जांच से मची खलबली?
महामंत्री हरि गिरि महाराज ने इस विवाद के पीछे एक बड़ा कारण अखाड़ों की जमीनों की जांच को बताया। उन्होंने कहा:
”हमने मेला अधिकारी से निवेदन किया था कि उन संत-महंतों की जांच की जाए जिन्होंने अखाड़े की सरकारी जमीन को अपने निजी नाम पर करवा लिया है। जांच शुरू होते ही अब कुछ लोग सामने आकर पद का दावा करने लगे हैं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य सिंहस्थ से पहले यह सुनिश्चित करना है कि अखाड़े की जमीन किसी व्यक्ति विशेष के बजाय अखाड़े के नाम पर ही रहे।
दावा बनाम संविधान: किसका पलड़ा भारी?
हरि गिरि महाराज ने रवींद्र पुरी के दावे को खारिज करते हुए कुछ तकनीकी सवाल उठाए:
- बहुमत का दावा: उन्होंने कहा कि 26 प्रतिनिधियों में से केवल 2 को छोड़कर बाकी सभी उनके साथ हैं। वैष्णव अखाड़े के कई प्रतिनिधियों ने प्रयागराज में उन्हें लिखित समर्थन दिया है, जिसके प्रमाण मौजूद हैं।
- नियमों का उल्लंघन: महाराज ने पूछा कि क्या अध्यक्ष के चयन के लिए कोई आधिकारिक एजेंडा जारी किया गया था? क्या तीन महीने पहले नियमानुसार नोटिस दिया गया था? उनके अनुसार, चुनाव की प्रक्रिया विधिवत रजिस्टर और संविधान के बिना पूरी नहीं हो सकती।
संत समाज में उठते सवाल: संविधान की अनदेखी का आरोप
वहीं दूसरी ओर, संतों का एक गुट इस पूरी व्यवस्था पर ही सवाल उठा रहा है। संतों के अनुसार, अखाड़ा परिषद का गठन चार संप्रदायों के मेल से होता है, लेकिन वर्तमान में समीकरण बिगड़े हुए हैं।
मुख्य आपत्तियां:
- पद का संतुलन: नियमानुसार यदि अध्यक्ष ‘संन्यासी’ अखाड़े का है, तो महामंत्री ‘बैरागी, निर्मल या उदासीन’ संप्रदाय का होना चाहिए। वर्तमान में एक गुट में दोनों पदों पर संन्यासी काबिज हैं, जिसे संत असंवैधानिक बता रहे हैं।
- 8 बनाम 5 का गणित: अखाड़ों के बीच ‘आठ-पांच’ का यह खेल पुराना है। हरिद्वार मेला प्रशासन की बैठकों में भी यह गुटबाजी साफ देखी गई है, जहाँ अक्सर एक गुट के केवल पांच प्रतिनिधि ही शामिल होते हैं।
निष्कर्ष:
फिलहाल अखाड़ा परिषद दो गुटों में बंटी नजर आ रही है। एक तरफ संप्रदायों के संतुलन की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ जमीनों के विवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं की। असली ‘अध्यक्ष’ कौन है, इसका फैसला अब दस्तावेजों और आगामी बैठकों की वैधता पर ही टिक गया है।
