एससी/एसटी एक्ट: सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच अनिवार्य, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
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नैनीताल:
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) अधिनियम के तहत सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य में किसी भी लोक सेवक (सरकारी कर्मचारी) के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच कराना पूरी तरह अनिवार्य होगा।
सेशन कोर्ट का आदेश निरस्त
यह फैसला जस्टिस आलोक मेहरा की एकलपीठ ने तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) भूपेंद्र धोनी और उपनिरीक्षक (एसआई) रमेश बोहरा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
- हाईकोर्ट ने हल्द्वानी के सत्र न्यायालय (सेशन कोर्ट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे।
- अदालत ने कहा कि बिना प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के मुकदमा दर्ज करने का निर्देश देना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है।
क्या था मामला?
- वर्ष 2024 का विवाद: नैनीताल की जिला एवं सत्र अदालत ने एक महिला की अर्जी पर सुनवाई करते हुए एक आरोपी युवक के साथ-साथ तत्कालीन सीओ और एसओ के खिलाफ भी एससी/एसटी एक्ट में मामला दर्ज करने का आदेश दिया था।
- जांच में नहीं मिले थे सबूत: महिला ने मारपीट और जातिसूचक टिप्पणियां करने के गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन पुलिस की शुरुआती जांच में इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई थी। इसके बाद पुलिस अधिकारियों ने सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया था।
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए साफ किया कि किसी भी सरकारी कर्मचारी पर इस तरह का मामला दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच में आरोपों की पुष्टि और संस्तुति (रिकमेंडेशन) होना कानूनी रूप से आवश्यक है।
